श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  1.2.59 
एइ श्लोक तत्त्व - लक्षण भागवत - सार ।
परिभाषा - रूपे इहार सर्वत्राधिकार ॥59॥
 
 
अनुवाद
इस श्लोक [पाठ 30] में इंगित सत्य ही श्रीमद्भागवत का सार है। पर्यायवाची शब्दों के माध्यम से यह निष्कर्ष सर्वत्र लागू होता है।
 
The truth stated in this verse (verse 30) is the essence of the Srimad Bhagavatam. This conclusion applies universally through synonyms.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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