Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.2.5 
यदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि तदप्यस्य तनु - भा य आत्मान्तर्यामी पुरुष इति सोऽस्यांश - विभवः ।
षड् - ऐश्वर्यैः पूर्णो य इह भगवान्स स्वयमयं न चैतन्यात्कृष्णाजगति पर - तत्त्वं परमिह ॥5॥
 
 
अनुवाद
उपनिषदों में जिसे निराकार ब्रह्म कहा गया है, वह उनके शरीर का तेज मात्र है, और परमात्मा कहे जाने वाले भगवान उनके स्थानीय अंश मात्र हैं। भगवान चैतन्य स्वयं भगवान कृष्ण हैं, जो छह ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं। वे परम सत्य हैं, और कोई भी अन्य सत्य उनसे बड़ा या उनके बराबर नहीं है।
 
What is described in the Upanishads as the impersonal Brahman is merely the effulgence of His body, and the Lord, known as the Paramatma, is His local, complete part and parcel. Lord Chaitanya is the Supreme Personality of Godhead, Sri Krishna, the Supreme Personality of Godhead, complete with the six opulences. He is the Absolute Truth, and no other Truth is greater than or equal to Him.
तात्पर्य
उपनिषदों के संकलनकर्ता निराकार ब्रह्म की अत्यंत प्रशंसा करते हैं। उपनिषद, जिन्हें वैदिक साहित्य का सबसे उत्कृष्ट भाग माना जाता है, उन लोगों के लिए अभिप्रेत हैं जो भौतिक संगति से मुक्त होना चाहते हैं और इसलिए ज्ञानोदय के लिए एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के पास जाते हैं। उप- उपसर्ग इंगित करता है कि व्यक्ति को एक आध्यात्मिक गुरु से परम सत्य का ज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिए। जिस व्यक्ति को अपने आध्यात्मिक गुरु में विश्वास होता है, वह वास्तव में पारलौकिक उपदेश प्राप्त करता है, और जैसे-जैसे भौतिक जीवन के प्रति उसका लगाव कम होता जाता है, वह आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने में सक्षम होता है। उपनिषदों के पारलौकिक विज्ञान का ज्ञान व्यक्ति को भौतिक जगत में अस्तित्व की उलझन से मुक्त कर सकता है, और जब इस प्रकार मुक्त हो जाता है, तो आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करके भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के आध्यात्मिक राज्य में ऊपर उठाया जा सकता है।

आध्यात्मिक ज्ञानोदय की शुरुआत निराकार ब्रह्म को समझने से होती है। इस तरह की प्राप्ति भौतिक विविधता के क्रमिक निषेध से होती है। निराकार ब्रह्म की प्राप्ति परम सत्य का आंशिक, दूर का अनुभव है जिसे व्यक्ति तर्कसंगत दृष्टिकोण के माध्यम से प्राप्त करता है। इसकी तुलना किसी पहाड़ी को दूर से देखने और एक धुंधले बादल के लिए लेने से की जाती है। एक पहाड़ी धुंधला बादल नहीं है, लेकिन यह हमारी अपूर्ण दृष्टि के कारण दूर से ऐसा प्रतीत होता है। परम सत्य की अपूर्ण या धुंधली प्राप्ति में, आध्यात्मिक विविधता इसकी अनुपस्थिति के कारण विशिष्ट है। इसलिए इस अनुभव को अद्वैतवाद या परम की एकता की प्राप्ति कहा जाता है।

ब्रह्म की निराकार ज्योतिर्मय चमक में केवल परम भगवान, श्री कृष्ण की व्यक्तिगत शारीरिक किरणें होती हैं। चूंकि श्री गौरसुंदर, या भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु, स्वयं श्री कृष्ण के समान हैं, इसलिए ब्रह्म तेज उनके पारलौकिक शरीर की किरणों से बना है।

इसी तरह, परमात्मा कही जाने वाली परमात्मा, चैतन्य महाप्रभु का एक पूर्ण प्रतिनिधित्व है। अंतर-यामी, हर किसी के हृदय में परमात्मा, सभी जीवित प्राणियों का नियंत्रक है। भगवत-गीता (15.15) में इसकी पुष्टि की गई है, जिसमें भगवान कृष्ण कहते हैं, सर्वस्य चाम हम हृदि संनिविष्ट: "मैं हर किसी के हृदय में स्थित हूं।" भगवद-गीता (5.29) यह भी बताती है, भोक्तामम यज्ञ-तपसाम सर्व-लोका-महेश्वरम, जो दर्शाता है कि परमात्मा के रूप में अपने विस्तार में कार्य करने वाले सर्वोच्च भगवान, हर चीज के स्वामी हैं। इसी तरह, ब्रह्म-संहिता (5.35) में कहा गया है, अंडअंतर-स्थ-परमानु-चयांतर-स्थम। भगवान हर जगह, हर जीवित प्राणी के हृदय में और प्रत्येक परमाणु में भी मौजूद हैं। इस प्रकार इस परमात्मा सुविधा से भगवान सर्वव्यापी हैं।

इसके अलावा, भगवान चैतन्य भी सभी धन, शक्ति, प्रसिद्धि, सुंदरता, ज्ञान और त्याग के स्वामी हैं क्योंकि वे स्वयं श्री कृष्ण हैं। उन्हें पूर्ण के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान चैतन्य की विशेषता में, भगवान एक आदर्श त्यागी हैं, जैसे श्री राम एक आदर्श राजा थे। भगवान चैतन्य ने संन्यास का आदेश स्वीकार किया और अपने स्वयं के जीवन में अत्यंत अद्भुत सिद्धांतों का उदाहरण दिया। संन्यास के क्रम में उनकी तुलना कोई नहीं कर सकता। यद्यपि कलि-युग में संन्यास के आदेश को स्वीकार करना आम तौर पर वर्जित है, भगवान चैतन्य ने इसे स्वीकार किया क्योंकि वे त्याग में पूर्ण हैं। दूसरे लोग उनका अनुकरण नहीं कर सकते, लेकिन केवल उनके नक्शेकदम पर जहाँ तक संभव हो चल सकते हैं। जो लोग जीवन के इस क्रम के लिए अयोग्य हैं, उन्हें शास्त्रों के आदेशों द्वारा इसे स्वीकार करने से सख्त मना किया गया है। हालाँकि, भगवान चैतन्य त्याग के साथ-साथ अन्य सभी ऐश्वर्यों में भी पूर्ण हैं। वे इसलिए परम सत्य का सर्वोच्च सिद्धांत हैं।

भगवान चैतन्य के सत्य के विश्लेषणात्मक अध्ययन से, यह ज्ञात होगा कि वे भगवान् कृष्ण से अलग नहीं हैं; कोई भी उनसे बड़ा या उनके समान नहीं है। भगवद्-गीता (7.7) में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, मत्तः परतरं नान्यत् किंचिदस्ति धनंजय: "हे धन के विजेता [अर्जुन], मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है।" इस प्रकार यहाँ इस बात की पुष्टि की गई है कि भगवान श्री कृष्ण चैतन्य से ऊँचा कोई सत्य नहीं है। जो लोग पारलौकिक ज्ञान की पुस्तकों का अध्ययन करते हैं उनका लक्ष्य अव्यक्त ब्रह्म होता है और जो लोग योग का अभ्यास करते हैं उनका लक्ष्य परमात्मा होता है। जो लोग ईश्वर को जानते हैं वे ब्रह्म और परमात्मा दोनों के बोध को पार कर जाते हैं क्योंकि भगवान पूर्ण ज्ञान का अंतिम प्लेटफॉर्म हैं। ईश्वर सच्चिदानंद (पूर्ण जीवन, ज्ञान और आनंद) के पूर्ण रूप हैं। पूर्ण के सत भाग (असीमित अस्तित्व) के बोध द्वारा, व्यक्ति भगवान के अव्यक्त ब्रह्म पहलू का बोध करता है। पूर्ण के चित भाग (असीमित ज्ञान) के बोध द्वारा, व्यक्ति भगवान के स्थानीयकृत पहलू, परमात्मा का बोध कर सकता है। लेकिन पूर्ण के इन दोनों आंशिक बोधों में से कोई भी आनंद या पूर्ण आनंद का बोध कराने में हमारी सहायता नहीं कर सकता। आनंद के ऐसे बोध के बिना, परम सत्य का ज्ञान अधूरा है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा चैतन्य-चरितामृत के इस छंद की पुष्टि श्रील जीव गोस्वामी द्वारा तत्व-संधर्भ में एक समानांतर कथन द्वारा की जाती है। तत्व-संधर्भ के आठवें भाग में कहा गया है कि परम सत्य को कभी-कभी अव्यक्त ब्रह्म के रूप में संपर्क किया जाता है, जो कि आध्यात्मिक होने के बावजूद, परम सत्य का केवल एक आंशिक प्रतिनिधित्व है। वैकुण्ठ में प्रधान देवता नारायण को श्री कृष्ण के विस्तार के रूप में जाना जाता है, लेकिन श्री कृष्ण ही परम परम सत्य हैं, जो सभी जीवित संस्थाओं के पारलौकिक प्रेम के उद्देश्य हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)