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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  1.2.26 
ज्ञान - योग - मार्गे ताँरे भजे येइ सब ।
ब्रह्म - आत्म - रूपे ताँरे करे अनुभव ॥26॥
 
 
अनुवाद
जो लोग ज्ञान और योग के मार्ग पर चलते हैं, वे केवल उन्हीं की पूजा करते हैं, क्योंकि वे उन्हें निराकार ब्रह्म और अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में देखते हैं।
 
Those who follow the path of knowledge and yoga worship the Lord because they experience Him as the impersonal Brahman and the omnipresent Supreme Being.
तात्पर्य
जो लोग मानसिक अटकल (ज्ञान-मार्ग) के शौकीन हैं या निरपेक्ष सत्य को खोजने के लिए रहस्यवादी योग में ध्यान करना चाहते हैं, उन्हें क्रमशः प्रभु की अवैयक्तिक चमक और उनके आंशिक प्रतिनिधित्व से संपर्क करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति प्रभु के शाश्वत रूप को महसूस नहीं कर सकते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)