व्यक्तिगत जीवों का मार्गदर्शक परमात्मा या परमात्मा, जीवों की इच्छाओं को पूरा करने में भाग नहीं लेता है, लेकिन वह भौतिक प्रकृति द्वारा उनकी पूर्ति की व्यवस्था करता है। जैसे ही एक व्यक्तिगत आत्मा परमात्मा के साथ अपने शाश्वत संबंध के प्रति सचेत हो जाती है और केवल उसी की ओर देखती है, वह तुरंत भौतिक भोग के उलझावों से मुक्त हो जाती है। कर्म के नियम में विश्वास नहीं रखने वाले ईसाई दार्शनिक यह तर्क देते हैं कि यह कहना बेतुका है कि किसी को अपने पिछले कर्मों के परिणामों को स्वीकार करना चाहिए जिसकी उसे कोई चेतना नहीं है। एक अपराधी को पहले कानून अदालत में गवाहों द्वारा उसके कुकर्मों की याद दिलाई जाती है, और फिर उसे दंडित किया जाता है। यदि मृत्यु पूर्ण विस्मरण है, तो किसी व्यक्ति को उसके पिछले दुष्कर्मों के लिए दंडित क्यों किया जाना चाहिए? परमात्मा की अवधारणा इन भ्रामक तर्कों का एक अजेय उत्तर है। परमात्मा व्यक्तिगत जीव के पिछले कार्यों का साक्षी है। एक आदमी को यह याद नहीं रहता कि उसने बचपन में क्या किया है, लेकिन उसके पिता, जिन्होंने उसे विकास के विभिन्न चरणों से गुजरते हुए देखा है, निश्चित रूप से याद करते हैं। इसी तरह, जीव कई जन्मों के माध्यम से शरीर में कई परिवर्तन undergoes, लेकिन परमात्मा हमेशा उसके साथ है और विभिन्न शरीरों के माध्यम से उसके विकास के बावजूद उसकी सभी गतिविधियों को याद रखता है।
