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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.2.19 
अनन्त स्फटिके यैछे एक सूर्य भासे ।
तैछे जीवे गोविन्देर अंश प्रकाशे ॥19॥
 
 
अनुवाद
जैसे एक ही सूर्य असंख्य रत्नों में प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही गोविन्द समस्त जीवों के हृदयों में परमात्मा के रूप में प्रकट होते हैं।
 
Just as the same sun is seen reflected in countless gems, similarly Govinda (in the form of God) appears in the hearts of all living beings.
तात्पर्य
सूर्य एक विशिष्ट स्थान पर स्थित है, लेकिन अनगिनत रत्नों में परिलक्षित होता है और असंख्य स्थानीय पहलुओं में प्रकट होता है। इसी तरह, परम व्यक्तित्व भगवान, यद्यपि अपनी पारलौकिक निवासस्थली गोलोक वृंदावन में अनंत रूप से उपस्थित हैं, सभी के हृदय में परमात्मा के रूप में परिलक्षित होते हैं। उपनिषद में कहा गया है कि जीव (जीवित इकाई) और परमात्मा (परमात्मा) एक ही वृक्ष में बैठे दो पक्षियों की तरह हैं। परमात्मा अतीत में किए गए कर्मों के परिणामस्वरूप जीव को फलदायी कार्य में संलग्न करता है, लेकिन परमात्मा का ऐसे कार्यों से कोई लेना-देना नहीं है। जैसे ही जीव फलदायी कार्य के संदर्भ में कार्य करना बंद कर देता है और भगवान (परमात्मा) की सेवा करता है, उसकी सर्वोच्चता को जानकर, वह तुरंत सभी पदनामों से मुक्त हो जाता है, और उस शुद्ध अवस्था में वह ईश्वर के राज्य में प्रवेश करता है, जिसे वैकुण्ठ कहा जाता है।

व्यक्तिगत जीवों का मार्गदर्शक परमात्मा या परमात्मा, जीवों की इच्छाओं को पूरा करने में भाग नहीं लेता है, लेकिन वह भौतिक प्रकृति द्वारा उनकी पूर्ति की व्यवस्था करता है। जैसे ही एक व्यक्तिगत आत्मा परमात्मा के साथ अपने शाश्वत संबंध के प्रति सचेत हो जाती है और केवल उसी की ओर देखती है, वह तुरंत भौतिक भोग के उलझावों से मुक्त हो जाती है। कर्म के नियम में विश्वास नहीं रखने वाले ईसाई दार्शनिक यह तर्क देते हैं कि यह कहना बेतुका है कि किसी को अपने पिछले कर्मों के परिणामों को स्वीकार करना चाहिए जिसकी उसे कोई चेतना नहीं है। एक अपराधी को पहले कानून अदालत में गवाहों द्वारा उसके कुकर्मों की याद दिलाई जाती है, और फिर उसे दंडित किया जाता है। यदि मृत्यु पूर्ण विस्मरण है, तो किसी व्यक्ति को उसके पिछले दुष्कर्मों के लिए दंडित क्यों किया जाना चाहिए? परमात्मा की अवधारणा इन भ्रामक तर्कों का एक अजेय उत्तर है। परमात्मा व्यक्तिगत जीव के पिछले कार्यों का साक्षी है। एक आदमी को यह याद नहीं रहता कि उसने बचपन में क्या किया है, लेकिन उसके पिता, जिन्होंने उसे विकास के विभिन्न चरणों से गुजरते हुए देखा है, निश्चित रूप से याद करते हैं। इसी तरह, जीव कई जन्मों के माध्यम से शरीर में कई परिवर्तन undergoes, लेकिन परमात्मा हमेशा उसके साथ है और विभिन्न शरीरों के माध्यम से उसके विकास के बावजूद उसकी सभी गतिविधियों को याद रखता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)