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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.2.17 
मुनयो वात - वासनाः श्र मणा ऊर्ध्व - मन्थिनः ।
ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ताः सन्यासिनोऽमलाः ॥17॥
 
 
अनुवाद
"जो नग्न साधु और संन्यासी कठोर शारीरिक तपस्या करते हैं, जो वीर्य को मस्तिष्क तक ले जा सकते हैं, और जो ब्रह्म में पूर्णतया समभाव रखते हैं, वे ब्रह्मलोक नामक क्षेत्र में रह सकते हैं।"
 
“Those naked sages and ascetics who perform severe physical austerities, who can raise their semen up to the brain (are urdhva-reta) and who are completely situated in Brahman, can reside in the realm called Brahmaloka.”
तात्पर्य
श्रीमद् भागवतम (11.6.47) के इस छंद में वात-वासनाः से तात्पर्य उन साधुओं से है जो वस्त्र आदि किसी भी भौतिक वस्तु की परवाह नहीं करते बल्कि पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर रहते हैं। ऐसे साधु शीत ऋतु या चिलचिलाती धूप में भी अपने शरीर को नहीं ढँकते। वे किसी भी प्रकार की शारीरिक पीड़ा से बचने का प्रयास नहीं करते और दर-दर भिक्षा मांग कर अपना जीवनयापन करते हैं। वे कभी भी जानबूझकर या अनजाने में अपने वीर्य का निर्वहन नहीं करते। इस ब्रह्मचर्य से वे वीर्य को मस्तिष्क तक पहुँचा पाते हैं जिससे वे अत्यंत बुद्धिमान हो जाते हैं और उनकी स्मरण शक्ति प्रखर हो जाती है। उनका मन कभी भी परम सत्य के चिन्तन से विचलित नहीं होता और ना ही भौतिक सुख की कामना से दूषित होता है। कठोर अनुशासन के साथ तपस्या का पालन करके ऐसे साधु प्रकृति के गुणों से परे एक तटस्थ स्थिति प्राप्त कर लेते हैं और निराकर ब्रह्म में विलीन हो जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)