श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.2.12 
ताँहार अङ्गेर शुद्ध किरण - मण्डल ।
उपनिषत्कहे ताँरे ब्रह्म सुनिर्मल ॥12॥
 
 
अनुवाद
उपनिषद जिसे दिव्य, निराकार ब्रह्म कहते हैं, वह उसी परम पुरुष के तेजस्वी तेज का क्षेत्र है।
 
What the Upanishads call the divine impersonal Brahman is the sphere of the luminous radiance of that Supreme Being.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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