श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  1.2.118 
चैतन्य - महिमा जानि ए सब सिद्धान्ते ।
चित्त दृढ़ ह ञा लागे महिमा - ज्ञान हैते ॥118॥
 
 
अनुवाद
ऐसे निर्णायक अध्ययन से मैं भगवान चैतन्य की महिमा को जानता हूँ। इन महिमाओं को जानकर ही मनुष्य उनके प्रति दृढ़ और दृढ़ आसक्ति प्राप्त कर सकता है।
 
Through such incisive study, I know the glories of Lord Chaitanya. Only by understanding these glories can a person become strong and steadfast in his devotion to Him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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