जब ब्रह्मा ने अनुभवात्मक दर्शन और कामनापूर्ति क्रियाओं की संस्कृति से मुक्त शुद्ध भक्तों की स्थिति का वर्णन किया, तो उन्होंने भक्ति के मार्ग पर चलने वाले व्यक्तियों से सुनने की प्रक्रिया की सिफारिश की। ऐसी मुक्त आत्माओं के नक्शेकदम पर चलना, जो वास्तविक दिव्य ध्वनि को कंपन करने में सक्षम हैं, किसी को भक्ति के उच्चतम चरण तक ले जा सकती हैं, और thus कोई महा-भागवत बन सकता है। भगवान चैतन्य महाप्रभु की सनातन गोस्वामी (मध्य 22.65) को दी गई शिक्षाओं से हम सीखते हैं:
शास्त्र-युक्तये सुनिपुण, दृढ़-श्रद्धा याँरा
'उत्तम-अधिकारी' सेई ताये संसार
"एक व्यक्ति जो प्रकट शास्त्रों के निष्कर्ष को समझने में निपुण है और जो पूरी तरह से भगवान के कारण के प्रति समर्पित है, वह वास्तव में दूसरों को भौतिक अस्तित्व के चंगुल से मुक्त करने में सक्षम है।" श्रील रूप गोस्वामी, अपने उपदेशामृत (3) में, सलाह देते हैं कि भक्ति सेवा के पंथ में तेजी से उन्नति करने के लिए व्यक्ति को बहुत सक्रिय रहना चाहिए और प्रकट शास्त्रों में निर्दिष्ट कर्तव्यों को पूरा करने और आध्यात्मिक गुरु द्वारा पुष्टि करने में दृढ़ रहना चाहिए। मुक्त आत्माओं के मार्ग और शुद्ध भक्तों की संगति ऐसी गतिविधियों को समृद्ध करती है।
अनुकरण करने वाले भक्तगण, जो अपने आप को वैष्णवों के रूप में ऊपर उठाना चाहते हैं और इसीलिए पहले के आचार्यों का अनुकरण करते हैं पर उनके सिद्धांतों का पालन नहीं करते हैं, श्रीमद्भागवतम् (2.3.24) के शब्दों में पत्थर हृदय के रूप में निंदित हैं| श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने उनकी पत्थर हृदय की स्थिति पर इस प्रकार से टिप्पणी की है: “बाहर आश्रु-पुलाकयो: सतोर अपि यद् धृदय न विक्रियेत तद अश्म-सारम इति कनिष्ठाधिकारिणां एव अश्म-सार-हृदयतया निंदैषा|” “जो अभ्यास से आँसू बहाते हैं पर जिनके हृदय नहीं बदले हैं, उन्हें सबसे निचले स्तर के पत्थर हृदय भक्त के रूप में जाना जाना चाहिए| उनका अनुकरणीय रोना, जो बनावटी अभ्यास से प्रेरित है, हमेशा निंदित है।” ऊपर उल्लिखित हृदय परिवर्तन की इच्छा भक्तिमय मार्ग के लिए अनुकूल न होने वाले किसी भी कार्य को करने की अनिच्छा में दिखाई पड़ती है| ऐसे हृदय परिवर्तन का सृजन करने के लिए, श्री कृष्ण और उनकी शक्तियों के बारे में निर्णायक विचार विमर्श नितांत आवश्यक है| झूठे भक्त सोच सकते हैं कि केवल आँसू बहाने से व्यक्ति को पारलौकिक धरातल पर ले जाया जाएगा, भले ही उनके हृदय में वास्तविक परिवर्तन न हुआ हो, पर अगर कोई दिव्य बोध नहीं है तो ऐसा अभ्यास निरर्थक है| झूठे भक्त, दिव्य ज्ञान के निष्कर्ष का अभाव होने की वजह से, सोचते हैं कि कृत्रिम रूप से आँसू बहाने से उन्हें मुक्ति मिल जाएगी| इसी तरह, अन्य झूठे भक्त सोचते हैं कि पिछले आचार्यों की पुस्तकों का अध्ययन करना अविश्वसनीय है, जैसे कि शुष्क अनुभवजन्य दर्शनों का अध्ययन करना| पर श्रील जीव गोस्वामी, पिछले आचार्यों का अनुसरण करते हुए, छह शोधों में शास्त्रों के निष्कर्षों का समावेश किया है जिन्हें शट्-संदर्भ कहते हैं| झूठे भक्त जिनको ऐसे निष्कर्षों का बहुत कम ज्ञान होता है वे भक्ति सेवा के लिए शुभ दिशा-निर्देशों को स्वीकार करने में उत्साह की कमी के कारण शुद्ध भक्ति प्राप्त करने में असफल हो जाते हैं जो स्वयं-साक्षात्कार भक्तों द्वारा दिया गया है| इस तरह के झूठे भक्त अवैयक्तिकवादियों की तरह हैं, जो भक्ति सेवा को साधारण फलदायी कार्यो से श्रेष्ठ नहीं मानते हैं|
