श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  1.2.110 
अतएव चैतन्य गोसाञि परतत्त्व - सीमा ।
ताँरे क्षीरोद - शायी कहि, कि ताँर महिमा ॥110॥
 
 
अनुवाद
अतः भगवान चैतन्य ही परम सत्य हैं। उन्हें क्षीरोदकशायी विष्णु कहने से उनकी महिमा में कोई वृद्धि नहीं होती।
 
Therefore Lord Sri Chaitanya Mahaprabhu is the ultimate truth. Calling him Kshirodakshayi Vishnu does not increase his glory.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd