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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  1.2.103 
जीव - शक्ति तटस्थाख्य, नाहि यार अन्त ।
मुख्य तिन शक्ति, तार विभेद अनन्त ॥103॥
 
 
अनुवाद
"इन दोनों के बीच की सीमांत शक्ति असंख्य जीवों से बनी है। ये तीन प्रमुख शक्तियाँ हैं, जिनकी असीमित श्रेणियाँ और उपविभाग हैं।"
 
"The neutral force between these two is made up of countless beings. These are the three primary forces, which have countless variations and sub-types.
तात्पर्य
भगवान की आंतरिक शक्ति, जिसे चित्त-शक्ति या अंतरांग-शक्ति कहा जाता है, उस विविधता को प्रदर्शित करता है जो कि पारलौकिक वैकुंठ ब्रह्मांड में है। स्वयं हमारे अतिरिक्त, ऐसी अनगिनत जीवित मुक्त आत्माएं हैं जो भगवान के व्यक्तित्व के साथ उसके असंख्य रूपों में जुड़ती हैं। भौतिक ब्रह्मांड बाहरी ऊर्जा प्रदर्शित करता है, जिसमें सशर्त जीवों को भौतिक मंदिर को छोड़ने के बाद भगवान के व्यक्तित्व में वापस जाने के लिए सभी स्वतंत्रता प्रदान की जाती है। श्वेताश्वतर उपनिषद (6.8) हमें बताता है:

न तस्य कार्यं करणं च विद्यते

 न तत्समश्चाभ्यधिकश्चा दृश्यते

परास्य शक्तिर विविधैव श्रूयते

 स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च

"परम प्रभु दूसरे के बिना एक है। उसे व्यक्तिगत रूप से कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है, न ही उसके पास भौतिक इंद्रियाँ हैं। कोई भी उसके बराबर या उससे बड़ा नहीं है। उसके पास विभिन्न नामों की असीमित, विभित्र शक्तियाँ हैं, जो स्वायत्त गुणों के रूप में उसके भीतर मौजूद हैं और उसे पूर्ण ज्ञान, शक्ति और आनंद प्रदान करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)