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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 2: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.2.10 
प्रकाश - विशेषे तेंह धरे तिन नाम ।
ब्रह्म, परमात्मा आर स्वयं - भगवान् ॥10॥
 
 
अनुवाद
उनके विभिन्न स्वरूपों के संदर्भ में, उन्हें तीन रूपों में जाना जाता है, जिन्हें निराकार ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा मूल भगवान कहा जाता है।
 
In view of His various manifestations, He is known in three aspects, which are called Nirvishesh Brahman, Spatial Paramatma and Adi Bhagavan.
तात्पर्य
श्रील जीवा गोस्वामी ने अपने भागवत-संदर्भ में भगवान शब्द की व्याख्या की है। ईश्वर सभी प्रकार की कल्पना करने योग्य और अकल्पनीय शक्तियों से पूर्ण होने के कारण परम निरपेक्ष पूर्ण हैं। निरपेक्ष ब्रह्म अपने पूर्ण शक्तियों के अभाव में महसूस किया गया परम सत्य का एक आंशिक प्रकटीकरण है। भगवान शब्द का पहला शब्दांश भ है, जिसका अर्थ है "पालन करने वाला" और "रक्षक"। अगला अक्षर, ग का अर्थ है "नेता", "प्रवर्तक" और "रचयिता"। व का अर्थ है "निवास" (सभी जीव परम भगवान में निवास करते हैं, और परम भगवान प्रत्येक जीवित प्राणी के हृदय में निवास करते हैं)। इन सभी अवधारणाओं को मिलाकर, भगवान शब्द ज्ञान, ऊर्जा, शक्ति, वैभव, शक्ति और प्रभाव में अकल्पनीय शक्ति का महत्व रखता है, जो सभी प्रकार की हीनताओं से रहित है। ऐसी अकल्पनीय शक्तियों के बिना, कोई भी पूरी तरह से जीवित नहीं रह सकता या रक्षा नहीं कर सकता। हमारी आधुनिक सभ्यता कई महान वैज्ञानिक दिमागों द्वारा तैयार की गई वैज्ञानिक व्यवस्थाओं द्वारा समर्थित है। इसलिए, हम केवल उस विशाल मस्तिष्क की कल्पना कर सकते हैं जिसकी व्यवस्था अनगिनत ग्रहों और उपग्रहों के गुरुत्वाकर्षण को बनाए रखती है और जो उस असीमित स्थान का निर्माण करती है जिसमें वे तैरते हैं। यदि कोई मनुष्य निर्मित उपग्रहों की कक्षा के लिए आवश्यक बुद्धि पर विचार करता है, तो उसे इस सोच में मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है कि विभिन्न ग्रह प्रणालियों की व्यवस्था के लिए कोई विशाल बुद्धि जिम्मेदार नहीं है। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि सभी विशाल ग्रह अंतरिक्ष में एक श्रेष्ठ बुद्धि की श्रेष्ठ व्यवस्था के बिना तैरते हैं। इस विषय को भगवद-गीता (15.13) में स्पष्ट रूप से निपटाया गया है, जहां भगवान कहते हैं, "मैं प्रत्येक ग्रह में प्रवेश करता हूं, और मेरी ऊर्जा से वे कक्षा में बने रहते हैं।" यदि ग्रहों को भगवान की पकड़ में नहीं रखा जाता, तो वे सभी हवा में धूल की तरह बिखर जाते। आधुनिक वैज्ञानिक भगवान की इस अकल्पनीय शक्ति को केवल अव्यवहारिक रूप से समझा सकते हैं।

अक्षरों भ, ग और व की शक्तियाँ कई अलग-अलग अर्थों के संदर्भ में लागू होती हैं। अपने विभिन्न शक्तिशाली एजेंटों के माध्यम से, भगवान सब कुछ की रक्षा और पालन करते हैं, लेकिन वे स्वयं व्यक्तिगत रूप से केवल अपने भक्तों की रक्षा और पालन करते हैं, जैसे एक राजा व्यक्तिगत रूप से अपने बच्चों की रक्षा और पालन करता है, जबकि राज्य की रक्षा और भरण-पोषण का काम विभिन्न प्रशासनिक एजेंटों को सौंपता है। भगवान अपने भक्तों के नेता हैं, जैसा कि हम भगवद-गीता से सीखते हैं, जिसमें उल्लेख किया गया है कि भगवान व्यक्तिगत रूप से अपने प्रिय भक्तों को निर्देश देते हैं कि भक्ति के मार्ग पर निश्चित प्रगति कैसे की जाए और इस तरह निश्चित रूप से भगवान के राज्य के करीब पहुंचा जाए। भगवान अपने भक्तों द्वारा दी गई सभी पूजा के प्राप्तकर्ता भी हैं, जिनके लिए वे उद्देश्य और लक्ष्य हैं। अपने भक्तों के लिए भगवान ईश्वर के प्रति पारलौकिक प्रेम की भावना विकसित करने के लिए एक अनुकूल स्थिति बनाते हैं। कभी-कभी वे किसी भक्त के भौतिक मोह को जबरदस्ती त्यागने और उसके सभी भौतिक सुरक्षात्मक एजेंटों को चकमा देकर ऐसा करते हैं, क्योंकि इस प्रकार भक्त को पूरी तरह से भगवान की सुरक्षा पर निर्भर रहना चाहिए। इस प्रकार भगवान अपने भक्तों के नेता सिद्ध होते हैं।

भगवान् सृजन, पालन और विनाश से सीधे जुड़े हुए नहीं हैं, क्योंकि वे आनंद में मग्न रहते हैं और साथ ही उन्हें अपनी आंतरिक शक्तियों से सज्ज भी रखते हैं। फिर भी जो ऊर्जा पदार्थ और जीवों का कारण बनी वह स्वयं ही पुरुशावतार के रूप में विस्तारित होती है और पुरुशावतार इन दोनों के गुणों से ही युक्त होते हैं। पुरूषावतार भी भगवत्तत्व की श्रेणी में आते हैं क्योंकि प्रत्येक ईश्वर के मूल रूप के समान ही होता है। जीव ईश्वर के अतिसूक्ष्म अंश हैं और गुणवत्ता में ईश्वर के समान हैं। वो इस भौतिक संसार में सांसारिक सुखों के लिए भेजे जाते हैं ताकि वो अपनी स्वतंत्रता की इच्छा को पूरा करें। फिर भी वो ईश्वर की सर्वोच्च इच्छा के अधीन हैं। ईश्वर अलौकिक आत्मा के रूप में स्वयं को प्रतिनियुक्त करते हैं ताकि वो सांसारिक सुखों की व्यवस्था का निरीक्षण कर सकें। एक अस्थायी मेले का उदाहरण इस संदर्भ में बिल्कुल उपयुक्त है। अगर एक राज्य के नागरिक थोड़े समय के लिए एक मेले में आनंद लेने के लिए एकत्र होते हैं, तो सरकार उस मेले की देखरेख के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त करती है। ऐसे अधिकारी को सरकार की सारी शक्ति दी जाती है और इसलिए वो सरकार के समान ही होता है। जब मेला खत्म हो जाता है, तो ऐसे अधिकारी की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है और वो अपने घर लौट जाते हैं। परमात्मा की तुलना ऐसे ही अधिकारी से की जाती है।

जीव पूरी तरह से सर्वोपरि नहीं होते हैं। निसंदेह वो ईश्वर के ही अंश होते हैं और गुणवत्ता में वो उनसे एक होते हैं फिर भी वो ईश्वर के नियंत्रण में होते हैं। इसलिए वो ईश्वर के समान या उनके बराबर के कभी नहीं होते हैं। जीव के साथ जो ईश्वर जुड़े होते हैं वो परमात्मा हैं, या सर्वोच्च जीव। इसलिए कोई भी छोटे जीवों और सर्वोच्च जीव को समान नहीं समझना चाहिए। जो अनश्वर सत्य भौतिक जगत के सृजन, पालन और विनाश के दौरान मौजूद रहता है और जिसमें जीव तल्लीन रहते हैं उसे निराकार ब्रह्मा कहा जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)