अक्षरों भ, ग और व की शक्तियाँ कई अलग-अलग अर्थों के संदर्भ में लागू होती हैं। अपने विभिन्न शक्तिशाली एजेंटों के माध्यम से, भगवान सब कुछ की रक्षा और पालन करते हैं, लेकिन वे स्वयं व्यक्तिगत रूप से केवल अपने भक्तों की रक्षा और पालन करते हैं, जैसे एक राजा व्यक्तिगत रूप से अपने बच्चों की रक्षा और पालन करता है, जबकि राज्य की रक्षा और भरण-पोषण का काम विभिन्न प्रशासनिक एजेंटों को सौंपता है। भगवान अपने भक्तों के नेता हैं, जैसा कि हम भगवद-गीता से सीखते हैं, जिसमें उल्लेख किया गया है कि भगवान व्यक्तिगत रूप से अपने प्रिय भक्तों को निर्देश देते हैं कि भक्ति के मार्ग पर निश्चित प्रगति कैसे की जाए और इस तरह निश्चित रूप से भगवान के राज्य के करीब पहुंचा जाए। भगवान अपने भक्तों द्वारा दी गई सभी पूजा के प्राप्तकर्ता भी हैं, जिनके लिए वे उद्देश्य और लक्ष्य हैं। अपने भक्तों के लिए भगवान ईश्वर के प्रति पारलौकिक प्रेम की भावना विकसित करने के लिए एक अनुकूल स्थिति बनाते हैं। कभी-कभी वे किसी भक्त के भौतिक मोह को जबरदस्ती त्यागने और उसके सभी भौतिक सुरक्षात्मक एजेंटों को चकमा देकर ऐसा करते हैं, क्योंकि इस प्रकार भक्त को पूरी तरह से भगवान की सुरक्षा पर निर्भर रहना चाहिए। इस प्रकार भगवान अपने भक्तों के नेता सिद्ध होते हैं।
भगवान् सृजन, पालन और विनाश से सीधे जुड़े हुए नहीं हैं, क्योंकि वे आनंद में मग्न रहते हैं और साथ ही उन्हें अपनी आंतरिक शक्तियों से सज्ज भी रखते हैं। फिर भी जो ऊर्जा पदार्थ और जीवों का कारण बनी वह स्वयं ही पुरुशावतार के रूप में विस्तारित होती है और पुरुशावतार इन दोनों के गुणों से ही युक्त होते हैं। पुरूषावतार भी भगवत्तत्व की श्रेणी में आते हैं क्योंकि प्रत्येक ईश्वर के मूल रूप के समान ही होता है। जीव ईश्वर के अतिसूक्ष्म अंश हैं और गुणवत्ता में ईश्वर के समान हैं। वो इस भौतिक संसार में सांसारिक सुखों के लिए भेजे जाते हैं ताकि वो अपनी स्वतंत्रता की इच्छा को पूरा करें। फिर भी वो ईश्वर की सर्वोच्च इच्छा के अधीन हैं। ईश्वर अलौकिक आत्मा के रूप में स्वयं को प्रतिनियुक्त करते हैं ताकि वो सांसारिक सुखों की व्यवस्था का निरीक्षण कर सकें। एक अस्थायी मेले का उदाहरण इस संदर्भ में बिल्कुल उपयुक्त है। अगर एक राज्य के नागरिक थोड़े समय के लिए एक मेले में आनंद लेने के लिए एकत्र होते हैं, तो सरकार उस मेले की देखरेख के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त करती है। ऐसे अधिकारी को सरकार की सारी शक्ति दी जाती है और इसलिए वो सरकार के समान ही होता है। जब मेला खत्म हो जाता है, तो ऐसे अधिकारी की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है और वो अपने घर लौट जाते हैं। परमात्मा की तुलना ऐसे ही अधिकारी से की जाती है।
जीव पूरी तरह से सर्वोपरि नहीं होते हैं। निसंदेह वो ईश्वर के ही अंश होते हैं और गुणवत्ता में वो उनसे एक होते हैं फिर भी वो ईश्वर के नियंत्रण में होते हैं। इसलिए वो ईश्वर के समान या उनके बराबर के कभी नहीं होते हैं। जीव के साथ जो ईश्वर जुड़े होते हैं वो परमात्मा हैं, या सर्वोच्च जीव। इसलिए कोई भी छोटे जीवों और सर्वोच्च जीव को समान नहीं समझना चाहिए। जो अनश्वर सत्य भौतिक जगत के सृजन, पालन और विनाश के दौरान मौजूद रहता है और जिसमें जीव तल्लीन रहते हैं उसे निराकार ब्रह्मा कहा जाता है।
