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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  1.17.91 
पड़िते आइला स्तवे नृसिंहेर नाम ।
शुनिया आविष्ट हैला प्रभु गौरधाम ॥91॥
 
 
अनुवाद
भगवान के सहस्रनामों का पाठ करते समय, समय के साथ भगवान नृसिंह का पवित्र नाम प्रकट हुआ। जब चैतन्य महाप्रभु ने भगवान नृसिंह का पवित्र नाम सुना, तो वे पूर्णतः विचारमग्न हो गए।
 
While reciting the Vishnu Sahasranama, the holy name of Lord Narasimha came to mind. Hearing the name, Mahaprabhu became completely immersed in the trance.
तात्पर्य
चैतन्य-मंगल, मध्य-खण्ड में इस घटना को इस प्रकार वर्णित किया गया है:- श्रीवास पंडित अपने पिता का श्राद्ध-कर्म करवा रहे थे और विधि-विधान के अनुसार भगवान विष्णु के सहस्त्र नाम सुन रहे थे। उसी समय गौरांग (भगवान चैतन्य) वहां पधारे और उन्होंने भी विष्णु के सहस्त्र नाम पूरे हर्ष के साथ सुनने आरंभ किये। जब उन्होंने नृसिंह भगवान के पावन नाम सुने तो भगवान चैतन्य विचार में डूब गए और वे क्रोध में प्रभु नृसिंह जैसी आकृति बनाकर क्रोधित हुए। उनकी भृकुटि टेढ़ी हो गई और शरीर के रोम रोम खड़े हो गए, शरीर का हर अंग काँपने लगा और गर्जना की ध्वनि करने लगे। एकाएक उन्होंने ईट उठा ली, लोग बहुत भयभीत हो गए, यह सोचकर कि,"हमें नहीं पता कि हमने कौन सा अपराध किया है!" किंतु तभी श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने विचारों को संयमित किया और अपने आसन पर बैठ गए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)