Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.17.9 
दीक्षा - अनन्तरे हैल, प्रेमेर प्रकाश ।
देशे आगमन पुनः प्रेमेर विलास ॥9॥
 
 
अनुवाद
गया में श्री चैतन्य महाप्रभु को ईश्वर पुरी द्वारा दीक्षा दी गई और उसके तुरंत बाद उनमें भगवद्प्रेम के लक्षण प्रकट हुए। घर लौटने पर भी उनमें ऐसे ही लक्षण प्रकट हुए।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu received initiation from Isvara Puri in Gaya, and immediately afterward, he displayed signs of love for God. Similar symptoms appeared upon his return home.
तात्पर्य
जब अनेक शिष्यों सहित श्री चैतन्य महाप्रभु गया गए, तो वे मार्ग में अस्वस्थ हो गए। उन्हें इतना तेज बुखार हुआ कि उन्होंने अपने शिष्यों से ब्राह्मणों के चरण पखारे जल लाने को कहा, और जब वे लाये तो प्रभु ने उसे पिया और ठीक हो गए। अतः प्रत्येक व्यक्ति को ब्राह्मण के पद का आदर करना चाहिए, जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने संकेत किया है। न तो प्रभु और न ही उनके अनुयायियों ने ब्राह्मणों का कोई अपमान किया।

प्रभु के अनुयायियों को ब्राह्मणों को पूरा सम्मान देने के लिये तत्पर रहना चाहिए। किंतु भगवान चैतन्य के पंथ के प्रचारक इस बात का विरोध करते हैं कि कोई आवश्यक योग्यताओं के बिना स्वयं को ब्राह्मण कहे। भगवान चैतन्य के अनुयायी अंधाधुंध यह स्वीকার नहीं कर सकते कि ब्राह्मण परिवार में जन्मा प्रत्येक व्यक्ति ब्राह्मण है। अतः किसी को अपने चरण-प्रक्षालित जल का पान करके ब्राह्मणों का सम्मान करने के प्रभु के उदाहरण का अंधाधुंध पालन नहीं करना चाहिए। कलि-युग के दूषित प्रभाव के कारण धीरे-धीरे ब्राह्मण परिवारों का ह्रास हो गया है। इसलिए वे लोगों की भावानाओं का शोषण करके उन्हें गुमराह करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)