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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.17.8 
तबेत करिला प्रभु गयाते गमन ।
ईश्वर - पुरीर सङ्गे तथाइ मिलन ॥8॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् भगवान गया गए, जहाँ उनकी भेंट श्रील ईश्वर पुरी से हुई।
 
After this, Mahaprabhu went to Gaya where he met Srila Isvara Puri.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु अपने पूर्वजों को सम्मानपूर्वक तर्पण चढ़ाने के लिए गया गए। इस प्रक्रिया को पिंड-दान कहते हैं। वैदिक समाज में किसी रिश्तेदार, विशेष रूप से माता-पिता के निधन के बाद व्यक्ति को गया जाना चाहिए और वहां भगवान विष्णु के चरणों में तर्पण चढ़ाना चाहिए। इसलिए प्रतिदिन सैकड़ों-हज़ारों लोग गया में तर्पण या श्राद्ध चढ़ाने के लिए एकत्र होते हैं। इस सिद्धांत का पालन करते हुए भगवान चैतन्य महाप्रभु भी अपने पिता के निधन पर पिंडदान करने गए थे। वहां उनका सौभाग्य से ईश्वर पुरी से मिलना हुआ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)