नामे स्तुति - वाद शुनि’ प्रभुर हैल दुःख ।
सबारे निषेधिल , - इहार ना देखिह मुख ॥73॥
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अनुवाद
जब एक छात्र ने पवित्र नाम की महिमा को अतिशयोक्तिपूर्ण प्रार्थना के रूप में व्याख्यायित किया, तो श्री चैतन्य महाप्रभु बहुत दुखी हुए और उन्होंने तुरंत सभी को चेतावनी दी कि वे आगे से उस छात्र का चेहरा न देखें।
When a student exaggerated the glories of the holy name in the form of a prayer, Chaitanya Mahaprabhu became very sad and immediately warned everyone not to even look at that student's face in the future.
तात्पर्य
एक बार जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान के पवित्र नाम, हरे कृष्ण महा-मंत्र की अलौकिक शक्ति का गौरवगान किया, तो एक दुर्भाग्यपूर्ण छात्र ने कहा कि पवित्र नाम का ऐसा गौरव, लोगों को उसके द्वारा प्रेरित करने के लिए शास्त्रों में अतिरंजना है। इस तरह से उस छात्र ने पवित्र नाम की महिमा की व्याख्या की। इसे अर्थ-वाद कहा जाता है और यह भगवान के पवित्र नाम के चरण कमलों में दस अपराधों में से एक है। कई प्रकार के अपराध हैं, लेकिन नाम-अपरध के रूप में जाना जाने वाला अपराध, पवित्र नाम के चरण कमलों पर अपराध, अत्यंत खतरनाक है। इसलिए भगवान ने सभी को चेतावनी दी कि वे अपराधी का चेहरा न देखें। भगवान ने तुरंत अपने सभी कपड़ों के साथ गंगा में स्नान किया ताकि सभी को इस तरह के नाम-अपरध से बचने के लिए सिखा सकें। पवित्र नाम भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के समान है। भगवान के व्यक्तित्व और उनके पवित्र नाम में कोई अंतर नहीं है। यह भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की पूर्ण स्थिति है। इसलिए जो भगवान और उनके नाम में भेद करता है, उसे पाषंडी या नास्तिक राक्षस कहा जाता है। पवित्र नाम का गौरव भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व का गौरवगान है। किसी को भी भगवान और उनके नाम में अंतर करने या पवित्र नाम की महिमा को अतिशयोक्ति के रूप में समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥