Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.17.7 
वायु - व्याधि - च्छले कैल प्रे म परकाश ।
भक्त - गण ल ञा कैल विविध विलास ॥7॥
 
 
अनुवाद
अपनी युवावस्था में भगवान ने शारीरिक वायु की अशांति का बहाना बनाकर कृष्ण के प्रति अपने आनंदमय प्रेम का प्रदर्शन किया। अपने परमप्रिय भक्तों के साथ उन्होंने इस प्रकार विविध लीलाओं का आनंद लिया।
 
In his youth, Mahaprabhu demonstrated his passionate love for Krishna under the pretext of a physical ailment. Thus, together with his intimate companions, he enjoyed various pastimes.
तात्पर्य
आयुर्वेदिक व्यवस्था के अनुसार, संपूर्ण शारीरिक तंत्र तीन तत्वों द्वारा संचालित होता है, नामतः वायु, पित्त और कफ (वायु, पित्त और बलगम)। शरीर के भीतर का स्राव रक्त, मूत्र और मल जैसे अन्य स्रावों में परिवर्तित हो जाता है, लेकिन अगर चयापचय में गड़बड़ी होती है, तो वायु के प्रभाव से स्राव कफ (बलगम) में बदल जाता है। आयुर्वेदिक प्रणाली के अनुसार, जब पित्त का स्राव और बलगम का निर्माण शरीर के भीतर वायु के संयोजन को परेशान करता है, तो उनचास प्रकार के रोग हो सकते हैं। ऐसा ही एक रोग पागलपन है। शारीरिक वायु और चयापचय में गड़बड़ी के कारण, श्री चैतन्य महाप्रभु ने क्रेजी की तरह काम किया। इस प्रकार, अपने स्कूल में, उन्होंने कृष्ण चेतना के माध्यम से क्रिया की व्याकरण की व्याख्या करना शुरू किया। व्याकरण में सब कुछ कृष्ण के संबंध में समझाते हुए, प्रभु ने अपने छात्रों को सांसारिक शिक्षा से बचना शुरू कर दिया, क्योंकि कृष्ण चेतना बनना बेहतर है और इस तरह शिक्षा के उच्चतम सिद्ध मंच को प्राप्त करना है। इन आधारों पर, श्री जीव गोस्वामी ने बाद में व्याकरण का संकलन किया जिसका नाम हरि-नामृत-व्यकरण है। सामान्य लोग इस तरह के स्पष्टीकरण को पागलपन मानते हैं। इसलिए, उनकी पागलता के दृष्टिकोण में प्रभु का उद्देश्य यह बताना था कि कृष्ण चेतना के अलावा हमारे अनुभव के भीतर कुछ भी नहीं है, क्योंकि सब कुछ कृष्ण चेतना के साथ जोड़ा जा सकता है। भगवान चैतन्य महाप्रभु के इन मनोरंजनों को चैतन्य-भागवत, मध्य-लीला, अध्याय एक में बहुत ही विशद रूप से वर्णित किया गया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)