Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  1.17.64 
प्रभुर शाप - वार्ता येइ शुने श्रद्धावान् ।
ब्रह्म - शाप हैते तार हय परित्राण ॥64॥
 
 
अनुवाद
जो भी श्रद्धालु व्यक्ति इस ब्राह्मण द्वारा भगवान चैतन्य को दिए गए श्राप के बारे में सुनता है, वह सभी ब्राह्मणीय श्रापों से मुक्त हो जाता है।
 
Any devotee who listens to that Brahmin saying that Mahaprabhu is cursing him, gets freed from all the Brahma curses.
तात्पर्य
मनुष्य को निश्‍चित निष्‍कर्ष के साथ यह जानना चाहिए कि प्रभु, विलक्षण होने के कारण, कभी भी किसी श्राप या वरदान के अधीन नहीं होते। केवल साधारण जीवित प्राणी ही श्राप और यमराज के दंड के अधीन होते हैं। भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व होने के नाते, श्री चैतन्य महाप्रभु ऐसे दंड और वरदान से परे हैं। जब कोई व्यक्ति इस तथ्य को विश्वास और प्रेम के साथ समझ जाता है, तो वह व्यक्तिगत रूप से ब्राह्मणों या किसी अन्य द्वारा उच्चारित सभी श्रापों से मुक्त हो जाता है। यह घटना चैतन्य-भागवत में वर्णित नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)