यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानम धर्मस्य
तदात्मानं सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनां
विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्म-संस्थापनार्थाय
सम्भवामि युगे युगे
"जो जब भी धार्मिक कार्यों में कमी आती है, हे भारत के वंशज, और अधर्म का उदय होने लगता है -- उस समय मैं स्वयं प्रकट होता हूँ। साधुओं की रक्षा करने और दुष्टों का विनाश करने के लिए, साथ ही धर्म के सिद्धांतों को स्थापित करने के लिए, मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।"
जैसा कि यहाँ बताया गया है, भगवान के अवतार का वास्तविक उद्देश्य नास्तिकों को मारना और भक्तों की रक्षा करना है। वह यह नहीं कहते, जैसा कि कई बदमाश अवतार कहते हैं, कि नास्तिक और भक्त एक ही मंच पर हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु, या भगवान श्री कृष्ण, जो कि भगवान के वास्तविक व्यक्तित्व हैं, ऐसे विचार की वकालत नहीं करते।
नास्तिक दंडनीय हैं, जबकि भक्तों की रक्षा की जानी है। इस सिद्धांत को बनाए रखना सभी अवतारों या अवतारों का मिशन है। इसलिए व्यक्ति को अवतार को उसकी गतिविधियों से पहचानना चाहिए, न कि लोकप्रिय मतों या मानसिक मनगढ़ंत विचारों से। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्तों को सुरक्षा दी और अपने उपदेश कार्य के दौरान कई राक्षसों को मार डाला। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि मायावादी दार्शनिक सबसे बड़े राक्षस हैं। इसलिए उन्होंने अन्य सभी को मायावादी दर्शन को सुनने से मना किया: मायावादी-भाष्य सुनिले हय सर्व-नाश। केवल शास्त्रों की मायावादी व्याख्या सुनकर ही व्यक्ति बर्बाद हो जाता है (Cc। मध्य 6.169)।
