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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  1.17.49 
लोक सब उद्घारिते तोमार अवतार ।
मुञि बड़ दुखी, मोरे करह उद्धार ॥49॥
 
 
अनुवाद
"ईश्वर के अवतार के रूप में, आप अनेक पतित आत्माओं का उद्धार कर रहे हैं। मैं भी एक अत्यंत दुखी पतित आत्मा हूँ। कृपया अपनी दया से मेरा उद्धार करें।"
 
"You are an incarnation of God and are saving many fallen souls. I too am a very sad fallen soul. Please save me too."
तात्पर्य
ऐसा प्रतीत होता है कि यद्यपि गोपाला चापाला पापी, वाचाल और अपमानजनक था, फिर भी उसके पास सादगी का गुण था। इस प्रकार उसका मानना था कि चैतन्य महाप्रभु भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के अवतार हैं जो सभी पतित आत्माओं को उद्धार करने आए थे, और उसने अपनी मुक्ति के लिए प्रार्थना की, प्रभु की दया की तलाश की। हालाँकि, वह यह नहीं जानता था कि पतितों का उद्धार उनके शारीरिक रोगों को ठीक करने में नहीं है, हालाँकि यह भी एक तथ्य है कि जब मनुष्य को भौतिक चंगुल से मुक्त किया जाता है तो उसके शारीरिक रोग स्वतः ही ठीक हो जाते हैं। गोपाला चापाला केवल कुष्ठ रोग के शारीरिक कष्टों से मुक्ति चाहता था, लेकिन श्री चैतन्य ने उनकी ईमानदारी से की गई अपील को स्वीकार करते हुए, उन्हें दुख के वास्तविक कारण के बारे में बताना चाहा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)