श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  1.17.46 
सर्वाङ्ग बेड़िल कीटे, काटे निरन्तर ।
असह्य वेदना, दुःखे ज्वलये अन्तर ॥46॥
 
 
अनुवाद
गोपाल चापाल का पूरा शरीर कीटाणुओं और कीड़ों से लगातार भरा हुआ था, जिससे उन्हें असहनीय पीड़ा हो रही थी। उनका पूरा शरीर पीड़ा से जल रहा था।
 
Insects infested his entire body and began biting him relentlessly. Gopal Chapal began to feel unbearable pain. His entire body burned with pain.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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