श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 320
 
 
श्लोक  1.17.320 
सप्तम परिच्छेदे ‘पञ्च - तत्त्वे’र आख्यान ।
पञ्च - तत्त्व मिलि’ ग्रैछे कैला प्रेम - दान ॥320॥
 
 
अनुवाद
सातवें अध्याय में पंचतत्व का वर्णन है - श्री चैतन्य, प्रभु नित्यानन्द, श्री अद्वैत, गदाधर और श्रीवास। ये सभी मिलकर सर्वत्र भगवान का प्रेम बाँटते हैं।
 
The seventh chapter describes the five elements—Sri Chaitanya Mahaprabhu, Nityananda Prabhu, Sri Advaita, Gadadhara, and Srivasa—who have all joined forces to spread the love of God everywhere.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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