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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.17.32 
ऊर्ध्व - बाहु करि’ कहों, शुन, सर्व - लोक ।
नाम - सूत्रे गाँथि’ पर कण्ठे एइ श्लोक ॥32॥
 
 
अनुवाद
मैं हाथ उठाकर घोषणा करता हूँ, "सब लोग मेरी बात सुनें! इस श्लोक को पवित्र नाम के धागे में पिरोकर निरंतर स्मरण के लिए अपने गले में धारण करें।"
 
I raise my hands and declare, "Please everyone listen to me! String this verse onto the thread of the holy name and wear it around your neck for constant remembrance."
तात्पर्य
हरे कृष्ण महामंत्र का जप करते समय, शुरुआत में कोई भी कई अपराध कर सकता है, जिन्हें नामभास और नाम-अपराध कहा जाता है। इस अवस्था में हरे कृष्ण महामंत्र का जप करके कृष्ण के लिए संपूर्ण प्रेम प्राप्त करने की कोई संभावना नहीं होती है। इसलिए व्यक्ति को हरे कृष्ण महामंत्र का जप ऊपर दिए गए श्लोक के सिद्धांतों के अनुसार करना चाहिए, तृणाद् अपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना। इस संबंध में ध्यान रखना चाहिए कि जप में ऊपरी और निचले होंठों के साथ-साथ जीभ की भी गतिविधियाँ शामिल होती हैं। इन तीनों का उपयोग हरे कृष्ण महामंत्र का जप करने में किया जाना चाहिए। "हरे कृष्ण" शब्द का उच्चारण बहुत स्पष्ट होना चाहिए और सुना जाना चाहिए। कभी-कभी कोई होंठों और जीभ की मदद से उचित उच्चारण के साथ जप करने के बजाय यांत्रिक रूप से एक फुफकारने की आवाज पैदा करता है। जप बहुत ही सरल है, लेकिन उसे गंभीरता से अभ्यास करना चाहिए। इसलिए श्री चैतन्य-चरितामृत के लेखक कृष्णदास कविराज गोस्वामी सभी को सलाह देते हैं कि इस श्लोक को हमेशा अपने गले में लटका कर रखें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)