श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.17.32 
ऊर्ध्व - बाहु करि’ कहों, शुन, सर्व - लोक ।
नाम - सूत्रे गाँथि’ पर कण्ठे एइ श्लोक ॥32॥
 
 
अनुवाद
मैं हाथ उठाकर घोषणा करता हूँ, "सब लोग मेरी बात सुनें! इस श्लोक को पवित्र नाम के धागे में पिरोकर निरंतर स्मरण के लिए अपने गले में धारण करें।"
 
I raise my hands and declare, "Please everyone listen to me! String this verse onto the thread of the holy name and wear it around your neck for constant remembrance."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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