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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 301
 
 
श्लोक  1.17.301 
पण्डित - गोसाञि आदि याँर येइ रस ।
सेइ सेइ रसे प्रभु हन ताँर वश ॥301॥
 
 
अनुवाद
गदाधर, स्वरूप दामोदर, रामानंद राय और छह गोस्वामी (जिनमें रूप गोस्वामी प्रमुख हैं) जैसे निजी सहयोगी सभी अपने-अपने दिव्य भावों में स्थित हैं। इस प्रकार भगवान विभिन्न दिव्य भावों में विभिन्न पदों को धारण करते हैं।
 
All of Mahaprabhu's personal associates, including Gadadhara Pandit, Swarup Damodara, Ramanand Rai, and Rupa Goswami, are situated in their respective divine rasas. Thus, Mahaprabhu becomes captivated by various divine rasas.
तात्पर्य
296-301 छंदों में श्री नित्यानंद, श्री अद्वैत प्रभु तथा अन्य भक्तों की भावपूर्ण भक्ति का संपूर्ण वर्णन किया गया है। इस तरह की वैयक्तिक सेवा का वर्णन करते हुए, गौर-गणोद्देश-दीपिका (11-16) घोषित करता है कि यद्यपि भगवान चैतन्य महाप्रभु एक भक्त के रूप में प्रकट हुए, पर वे नंद महाराज के पुत्र के अलावा और कोई नहीं हैं। इसी प्रकार, यद्यपि श्री नित्यानंद प्रभु भगवान चैतन्य के सहायक के रूप में प्रकट हुए, पर वे हलधारी बलराम के अलावा और कोई नहीं हैं। अद्वैत आचार्य आध्यात्मिक संसार से सादाशिव के अवतार हैं। श्रीवास ठाकुर के नेतृत्व में सभी भक्त उनकी सीमांत ऊर्जा हैं, जबकि गदाधर पंडित के नेतृत्व में भक्त उनकी आंतरिक शक्ति की अभिव्यक्ति हैं।

श्री चैतन्य महाप्रभु, अद्वैत प्रभु और नित्यानंद प्रभु, सभी विष्णु-तत्व श्रेणी से संबंध रखते हैं। क्योंकि भगवान चैतन्य दया के एक सागर हैं, उन्हें महाप्रभु कहकर संबोधित किया जाता है, जबकि नित्यानंद और अद्वैत, भगवान चैतन्य की सहायता करने वाले दो महान व्यक्तित्व, प्रभु कहलाते हैं। इस तरह से दो प्रभु और एक महाप्रभु हैं। गदाधर गोस्वामी एक पूर्ण ब्राह्मण गुरु का प्रतिनिधि है। श्रीवास ठाकुर एक संपूर्ण ब्राह्मण भक्त का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन पांचों को पंच-तत्व के रूप में जाना जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)