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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.17.28 
काटिलेह तरु येन किछु ना बोलय ।
शुकाइया मरे, तबु जल ना मागय ॥28॥
 
 
अनुवाद
“क्योंकि यदि कोई पेड़ काट भी दे, तो वह कभी विरोध नहीं करता, और यदि वह सूखकर मर भी जाए, तो भी वह किसी से पानी नहीं मांगता।
 
Even if someone cuts a tree, it does not resist, nor does it beg for water from anyone when it dries up and dies.
तात्पर्य
हिंसा पर नियंत्रण (तरोर इव सहष्णुना) रखने का यह अभ्यास बहुत कठिन है, किन्तु जब कोई वास्तव में हरे कृष्ण मंत्र का जाप करना प्रारंभ करता है, तो हिंसा सहने का गुण स्वतः ही विकसित हो जाता है। हरे कृष्ण मंत्र का जाप करके जो व्यक्ति कृष्णभावना में उन्नत हो चुका है उसे अलग से हिंसा सहने का गुण विकसित करने के लिए अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि भक्त मात्र हरे कृष्ण मंत्र का नियमित जाप करके सभी अच्छे गुणों को विकसित कर लेता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)