श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 264
 
 
श्लोक  1.17.264 
मोरे निन्दा करे ये, ना करे नमस्कार ।
ए - सब जीवेरे अवश्य करिब उद्धार ॥264॥
 
 
अनुवाद
“मुझे अवश्य ही उन सभी पतित आत्माओं का उद्धार करना होगा जो मेरी निन्दा करते हैं और मुझे प्रणाम नहीं करते हैं।
 
“I must save all these fallen people who slander me and do not greet me.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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