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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 244
 
 
श्लोक  1.17.244 
चरणेर धूलि सेइ लय वार वार ।
देखिया प्रभुर दुःख हइल अपार ॥244॥
 
 
अनुवाद
जब वह बार-बार उनके चरणकमलों की धूल ग्रहण कर रही थी, तब भगवान् अत्यधिक दुःखी हो रहे थे।
 
As the woman repeatedly began to take the dust from his feet, Mahaprabhu felt immense sorrow.
तात्पर्य
किसी महान हस्ती के चरण कमलों की यह धारण निश्चित रूप से उस व्यक्ति के लिए बहुत अच्छी होती है जो धूल लेता है, लेकिन श्री चैतन्य महाप्रभु के दुख का यह उदाहरण बताता है कि वैष्णव को किसी को भी अपने पैरों से धूल नहीं लेनी चाहिए।

जो व्यक्ति किसी महापुरुष के चरण कमलों की धूल लेता है, वह अपने पाप कर्मों को उस महापुरुष पर स्थानांतरित कर देता है। जब तक जिस व्यक्ति की धूल ली जाती है वह बहुत मजबूत नहीं होता, उसे धूल लेने वाले व्यक्ति के पाप कर्मों को भोगना पड़ता है। इसलिए आमतौर पर इसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। कभी-कभी बड़ी सभाओं में लोग हमारे पैर छूकर वैसा ही लाभ लेने आते हैं। इस वजह से कभी-कभी हमें किसी बीमारी से भी जूझना पड़ता है। जहाँ तक संभव हो, किसी बाहरी व्यक्ति को अपने पैर छूकर उनसे धूल लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने व्यक्तिगत रूप से अपने उदाहरण से यह दिखाया, जैसा कि अगले श्लोक में बताया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)