श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 237
 
 
श्लोक  1.17.237 
वंशी - वाद्ये गोपी - गणेर वने आकर्षण ।
ताँ - सबार सङ्गे यैछे वन - विहरण ॥237॥
 
 
अनुवाद
श्रीवास ठाकुर ने विस्तार से बताया कि किस प्रकार गोपियाँ कृष्ण की बांसुरी की ध्वनि से वृन्दावन के वनों की ओर आकर्षित हुईं और किस प्रकार वे वन में एक साथ विचरण करने लगीं।
 
Srivasa Thakura explained in detail how the gopis were attracted to the forests of Vrindavan by the tune of Krishna's flute and how they roamed around with him in the forest.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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