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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 232
 
 
श्लोक  1.17.232 
‘देखिनु’ ‘देखिनु’ बलि’ हइल पागल ।
प्रेमे नृत्य करे, हैल वैष्णव आगल ॥232॥
 
 
अनुवाद
“मैंने देखा है! मैंने देखा है!” कहते हुए और पागलों की तरह आनंदित प्रेम में नाचते हुए, वह प्रथम श्रेणी के वैष्णव बन गए।
 
"I have seen it! I have seen it!" Saying this and dancing like a mad man in ecstasy, the tailor became a Vaishnava of the highest order.
तात्पर्य
श्रीवासा ठाकुर के घर के पास एक मुसलमान दर्जी रहता था, जो उनके परिवार के कपड़े सिलता था। एक दिन वह श्री चैतन्य महाप्रभु के नृत्य को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ; वास्तव में, वह मंत्रमुग्ध हो गया था। उसके भाव को समझकर, प्रभु ने उसे कृष्ण के रूप में अपना मूल स्वरूप दिखाया। तब दर्जी ने "मैंने देखा है! मैंने देखा है!" कहते हुए नृत्य करना शुरू कर दिया। वह परमानंदमय प्रेम में लीन हो गया और भगवान चैतन्य के साथ नृत्य करने लगा। इस प्रकार वह श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख वैष्णव अनुयायियों में से एक बन गया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)