Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 200
 
 
श्लोक  1.17.200 
सेइ हैते जिह्वा मोर बले ‘हरि’ ‘हरि’ ।
इच्छा नाहि, तबु बले, - कि उपाय करि ॥200॥
 
 
अनुवाद
"उस समय से मेरी जीभ भी हमेशा "हरि, हरि" की ध्वनि करती रहती है। कहने की मेरी इच्छा नहीं होती, फिर भी मेरी जीभ कहती रहती है। समझ नहीं आता क्या करूँ।"
 
"Since then, my tongue has been constantly chanting "Hari, Hari." Even though I don't want to say it, it keeps saying it. I don't know what to do."
तात्पर्य
कभी-कभी दानवीय नास्तिक लोग, पवित्र नाम की क्षमता को न समझ पाते हैं, इसलिए वे वैष्णवों द्वारा हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करने पर उनका उपहास करते हैं। ऐसा मजाक भी ऐसे लोगों के लिए फायदेमंद होता है। श्रीमद्-भागवतम, छठा कांड, अध्याय दो, श्लोक 14 बताता है कि हरे कृष्ण महामंत्र का जाप, मजाक में भी, सामान्य चर्चा के दौरान, किसी बाहरी चीज को इंगित करने के लिए या उपेक्षा में, नामभास कहलाता है, जो कि एक ऐसा जाप है जो लगभग पारलौकिक अवस्था पर होता है। यह नामभास अवस्था नाम अपराध से बेहतर है। नामभास भगवान विष्णु की सर्वोच्च स्मृति को जगाता है। जब कोई भगवान विष्णु को याद करता है, तो वह भौतिक सुख से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार वह धीरे-धीरे भगवान की पारलौकिक सेवा की ओर बढ़ता है और पारलौकिक स्थिति में भगवान के पवित्र नाम का जाप करने का पात्र बन जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)