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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.17.16 
तबे नित्यानन्द - गोसाञि र व्यास - पूजन ।
नित्यानन्दावेशे कैल मुषल धारण ॥16॥
 
 
अनुवाद
तब नित्यानंद प्रभु ने भगवान श्री गौरसुंदर की व्यास-पूजा, या आध्यात्मिक गुरु की पूजा, करने की व्यवस्था की। लेकिन भगवान चैतन्य नित्यानंद प्रभु होने के आनंद में, मुशल नामक हल-जैसा अस्त्र धारण किए हुए थे।
 
Then Nityanand Prabhu made arrangements to perform Vyas-puja i.e. Guru-puja of Lord Shri Gaursundar. But Sri Chaitanya Mahaprabhu came in the spirit of Nityananda Prabhu and took the pestle.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश से, नित्यानंद प्रभु ने पूर्णिमा की रात को भगवान की व्यास-पूजा की व्यवस्था की। उन्होंने व्यासदेव के माध्यम से व्यास-पूजा या गुरु-पूजा की व्यवस्था की। चूंकि व्यासदेव उन सभी के मूल गुरु हैं जो वैदिक सिद्धांतों का पालन करते हैं, गुरु की पूजा व्यास-पूजा कहलाती है। नित्यानंद प्रभु ने व्यास-पूजा की व्यवस्था की और संकीर्तन चल रहा था, लेकिन जब उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के कंधों पर माला डालने की कोशिश की, तो उन्होंने खुद को भगवान चैतन्य में देखा। भगवान चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु या कृष्ण और बलराम की आध्यात्मिक स्थिति में कोई अंतर नहीं है। वे सभी ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के विविध अवतार हैं। इस विशेष अवसर में, भगवान चैतन्य महाप्रभु के सभी भक्तों ने समझ लिया कि भगवान चैतन्य और नित्यानंद प्रभु में कोई अंतर नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)