शब्द शास्त्र, धातु या क्रिया मूल, शस् से बना है। शस्-धातु का सम्बन्ध नियंत्रण या शासन से है। शस्त्र या बल के द्वारा सरकार के शासन को शास्त्र कहा जाता है। इसलिए, जब भी कोई शासन होता है, चाहे हथियारों से हो या निर्देशों से, शस-धातु मूल सिद्धांत होती है। शस्त्र (हथियारों के द्वारा शासन) और शास्त्र (धर्मग्रंथों के निर्देशों के द्वारा शासन), के बीच, श्रेष्ठ शास्त्र होता है। हमारे वैदिक धर्मग्रंथ मानवीय सामान्य ज्ञान के साधारण विधि पुस्तकें नहीं हैं; वे वास्तविक रूप से मुक्त व्यक्तियों के कथन हैं जो इंद्रियों की अपूर्णता से अप्रभावित हैं।
शास्त्र हमेशा सही होना चाहिए, कभी-कभी सही और कभी-कभी गलत नहीं। वैदिक धर्मग्रंथों में, गाय को माँ के रूप में वर्णित किया गया है। इसलिए वह हमेशा के लिए माँ है; यह ऐसा नहीं है, जैसा कि कुछ बदमाश कहते हैं, कि वैदिक युग में वह माँ थी, लेकिन इस युग में नहीं है। यदि शास्त्र एक अधिकार है, तो गाय हमेशा एक माँ है; वह वैदिक युग में एक माँ थी, और वह इस युग में भी एक माँ है।
यदि कोई शास्त्र के निर्देशों के अनुसार कार्य करता है, तो वह पापमय गतिविधि के परिणामों से मुक्त हो जाता है। उदाहरण के लिए, मांस खाने, शराब पीने और यौन सुख लेने की प्रवृत्ति सभी सशर्त आत्मा के लिए स्वाभाविक हैं। ऐसे आनंद के मार्ग को प्रवृत्ति-मार्ग कहा जाता है। शास्त्र कहते हैं, प्रवृत्तिर एषा भूतानां निवृत्तिस् तु महा-फला: किसी को भी दोषपूर्ण सशर्त जीवन की प्रवृत्तियों द्वारा दूर नहीं किया जाना चाहिए; किसी को शास्त्रों के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए। एक बच्चे की प्रवृत्ति पूरे दिन खेलने की होती है, लेकिन शास्त्रों का निर्देश है कि माता-पिता को उसे शिक्षित करने का ध्यान रखना चाहिए। शास्त्र मानव समाज की गतिविधियों का मार्गदर्शन करने के लिए हैं। लेकिन क्योंकि लोग शास्त्रों के निर्देशों का संदर्भ नहीं लेते हैं, जो दोषों और अपूर्णताओं से मुक्त हैं, इसलिए वे तथाकथित शिक्षित शिक्षकों और नेताओं द्वारा गुमराह होते हैं जो सशर्त जीवन की कमियों से भरे होते हैं।
