श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  1.17.157 
प्रवृत्ति - मार्गे गो - वध करिते विधि हय ।
शास्त्र - आज्ञाय वध कैले नाहि पाप - भय ॥157॥
 
 
अनुवाद
"भौतिक कर्मों के मार्ग में गौहत्या का विधान है। यदि ऐसी हत्या शास्त्रों के अनुसार की जाए, तो कोई पाप नहीं लगता।"
 
"Cow slaughter is a rule in the path of material activity. If such slaughter is done according to the scriptures, it is not sinful."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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