श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 151
 
 
श्लोक  1.17.151 
एइ मत दुँहार कथा हय ठारे - ठोरे ।
भितरेर अर्थ केह बुझिते ना पारे ॥151॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार काजी और भगवान ने आपस में अनेक संकेतों से बातचीत की, परन्तु कोई भी बाहरी व्यक्ति उनकी बातचीत का आन्तरिक अर्थ नहीं समझ सका।
 
In this way Mahaprabhu and the Qazi kept talking to each other through signs, but no outsider could understand the inner meaning of their conversation.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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