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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  1.17.144 
दूर हइते आइला काजी माथा नोयाइयो ।
काजीरे वसाइला प्रभु सम्मान करिया ॥144॥
 
 
अनुवाद
जब काजी आया तो उसका सिर झुक गया, भगवान ने उसे उचित सम्मान दिया और आसन दिया।
 
When the Qazi came with his head bowed, Mahaprabhu respected him and gave him a seat to sit.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु के अहिंसक आंदोलन में कुछ पुरुष बहुत उद्वेलित हो गए, क्योंकि वे अपने मन को नियंत्रण में नहीं रख पा रहे थे। लेकिन प्रभु बड़े शांत, गंभीर और अविचलित थे। इसलिए जब काज़ी उन्हें देखने आए, तो प्रभु ने उन्हें सम्मान दिया और उन्हें बैठने के लिए आसन दिया, क्योंकि वे एक सम्माननीय सरकारी अधिकारी थे। इस तरह प्रभु ने अपने व्यक्तिगत आचरण से हमें शिक्षा दी। कृष्ण चैतन्य के आंदोलन को आगे बढ़ाने में, हमें शायद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन हमें हमेशा श्री चैतन्य महाप्रभु के पदचिन्हों पर चलना चाहिए और समय और परिस्थितियों के अनुसार करना चाहिए जो करने योग्य है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)