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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 140
 
 
श्लोक  1.17.140 
तर्ज - गर्ज करे लोक, करे कोलाहल ।
गौरचन्द्र - बले लोक प्रश्रय - पागल ॥140॥
 
 
अनुवाद
क्रोध में बड़बड़ाते और गर्जना करते हुए, भगवान चैतन्य के संरक्षण में लोग ऐसे भोग-विलास से उन्मत्त हो गए।
 
Whispering and roaring with anger, all the people went mad doing this under the protection of Mahaprabhu.
तात्पर्य
काज़ी ने पवित्र नाम का कीर्तन, सामूहिक मंत्रोच्चार नहीं करने का आदेश जारी किया था। लेकिन जब यह बात श्री चैतन्य महाप्रभु के सामने लाई गई, तो उन्होंने काज़ी के आदेश की अवज्ञा करने का आदेश दिया। स्वभावतः उत्साही होते हुए भी उत्तेजित भगवान चैतन्य और उनके सभी भक्तों ने अपने ऊंचे स्वरों से बहुत शोर मचाया होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)