श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  1.17.116 
नित्यानन्द - गोसाञि प्रभुर आवेश जानिल ।
गङ्गा - जल - पात्र आ नि’ सम्मुखे धरिल ॥116॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की भाव-विभोर मनोदशा को समझते हुए नित्यानंद प्रभु गोसांई ने प्रतीक स्वरूप गंगाजल का एक पात्र लाकर उनके समक्ष रख दिया।
 
Nityananda Prabhu Goswami understood the emotional state of Sri Chaitanya Mahaprabhu, so as a sign he brought Ganga water in a vessel and placed it in front of him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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