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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 17: चैतन्य महाप्रभु की युवावस्था की लीलाएँ  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  1.17.111 
गोप - गृहे जन्म छिल, गाभीर राखाल ।
सेइ पुण्ये हैलाँ एबे ब्राह्मण - छाओयाल ॥111॥
 
 
अनुवाद
"पिछले जन्म में मैं ग्वालों के घर पैदा हुआ था और मैंने बछड़ों और गायों की रक्षा की थी। ऐसे पुण्य कर्मों के कारण अब मैं ब्राह्मण पुत्र बन गया हूँ।"
 
"In my previous life, I was born into a family of cowherds and protected cows and calves. Because of these virtuous deeds, I have now come as a Brahmin's son."
तात्पर्य
भगवान चैतन्य महाप्रभु, सर्वोच्च अधिकारी, के कथनों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि केवल गायों को पालने और उनकी रक्षा करने से व्यक्ति धार्मिक बन जाता है। दुर्भाग्य से, लोग ऐसे दुष्ट बन गए हैं कि वे किसी अधिकारी की बातों पर भी ध्यान नहीं देते। आमतौर पर लोग ग्वालों को समाज के निम्न सदस्य मानते हैं, परंतु यहां चैतन्य महाप्रभु पुष्टि करते हैं कि वे इतने धार्मिक होते हैं कि अगले जन्म में वे ब्राह्मण बनते हैं। जाति व्यवस्था का एक विशिष्ट उद्देश्य है। यदि इस वैज्ञानिक प्रणाली का पालन किया जाए, तो मानव समाज को इसका अतिशय लाभ मिलेगा। प्रभु के इस निर्देश का पालन करते हुए, लोगों को गायों और बछड़ों की सेवा करनी चाहिए और बदले में भरपूर मात्रा में दूध प्राप्त करना चाहिए। गायों और बछड़ों की सेवा करने में कोई हानि नहीं है, लेकिन आधुनिक मानव समाज इतना नीच हो गया है कि गायों की रक्षा करने और उनकी सेवा करने के बजाय, लोग उनका वध कर रहे हैं। ऐसे पापपूर्ण कृत्य करते हुए वे मानव समाज में शांति और समृद्धि की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? यह असंभव है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)