श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  1.16.87 
शुनिया प्रभुर व्याख्या दिग्विजयी विस्मित ।
मुखे ना निःसरे वाक्य, प्रतिभा स्तम्भित ॥87॥
 
 
अनुवाद
भगवान चैतन्य महाप्रभु का स्पष्टीकरण सुनकर महाकवि आश्चर्यचकित रह गए। उनकी चतुराई स्तब्ध रह गई, वे कुछ भी न बोल सके।
 
After listening to the explanation of Chaitanya Mahaprabhu, the victorious poet was stunned, all his cleverness became numb and no words came out of his mouth.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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