श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  1.16.71 
रसालङ्कार - वत् काव्यं दोष - मुक् चेद् विभूषितम् ।
स्याद्वपुः सुन्दरमपि श्वित्रेणैकेन दुर्भगम् ॥71॥
 
 
अनुवाद
'जिस प्रकार आभूषणों से सुसज्जित होने पर भी शरीर श्वेत कुष्ठ के एक दाग से अभागा हो जाता है, उसी प्रकार अनुप्रास, उपमा और रूपकों के बावजूद भी एक त्रुटि से सम्पूर्ण काव्य व्यर्थ हो जाता है।'
 
“Just as a body adorned with jewels becomes inauspicious with even a single spot of white leprosy, similarly a whole poem, though full of alliteration, simile and metaphor, becomes useless with just one flaw.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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