श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  1.16.67 
तिन पादे अनुप्रास देखि अनुपम ।
एक पादे नाहि, एइ दोष ‘भग्न - क्रम’ ॥67॥
 
 
अनुवाद
"इस पद्य की तीन पंक्तियों में असाधारण अनुप्रास है, किन्तु एक पंक्ति में ऐसा कोई अनुप्रास नहीं है। यह विचलन का दोष है।"
 
Three lines of this stanza have unique alliteration, but one line lacks alliteration at all. This is a defect called fractal order.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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