श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  1.16.61 
‘अविमृष्ट - विधेयांश’ - एइ दोषेर नाम ।
आर एक दोष आछे, शुन सावधान ॥61॥
 
 
अनुवाद
"अविमृष्ट-विद्येांश, इसमें केवल दोष ही नहीं है, अपितु एक और दोष भी है, जो मैं तुम्हें बताता हूँ। कृपया ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनो।
 
Not only is there a flaw in the avimrishtavidheyaṃśa, but there is also another flaw that I am going to point out to you. Please listen carefully.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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