श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  1.16.32 
व्याकरण - मध्ये, जानि, पड़ाह कलाप ।
शुनिहुँ फाङ्किते तोमार शिष्येर संलाप ॥32॥
 
 
अनुवाद
"मैं समझता हूँ कि आप कलाप-व्याकरण पढ़ाते हैं। मैंने सुना है कि आपके छात्र इस व्याकरण के शब्द-जाल में बहुत निपुण हैं।"
 
"I understand you teach Kalapa grammar. I've heard that your students are very adept at the vocabulary of this grammar."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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