श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.16.22 
अन्तरे जानिला प्रभु, याते अन्तर्यामी ।
देशेरे आइला प्रभु शची - दुःख जानि’ ॥22॥
 
 
अनुवाद
भगवान चैतन्य को लक्ष्मीदेवी के अन्तर्धान होने का ज्ञान था क्योंकि वे स्वयं परमात्मा हैं। अतः वे अपनी माता शचीदेवी को सांत्वना देने के लिए घर लौट आए, जो अपनी पुत्रवधू की मृत्यु से अत्यंत दुःखी थीं।
 
Mahaprabhu knew of Lakshmidevi's disappearance, for He is the Supreme Being Himself. Thus, He returned home to console His mother, Shachidevi, who was deeply saddened by the passing of her daughter-in-law.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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