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श्लोक 1.16.2  |
जय जय श्री - चैतन्य जय नित्या नन्द ।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौर - भक्त - वृन्द ॥2॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! भगवान नित्यानंद की जय हो! अद्वैतचंद्र की जय हो! और भगवान के सभी भक्तों की जय हो! |
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| Victory to Sri Chaitanya Mahaprabhu! Victory to Sri Nityananda Prabhu! Victory to Sri Advaitachandra and to all the devotees of Mahaprabhu! |
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