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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 16: महाप्रभु की बाल्य तथा कैशोर लीलाएँ  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  1.16.108 
भाग्यवन्त दिग्विजयी सफल - जीवन ।
विद्या - बले पाइल महाप्रभुर चरण ॥108॥
 
 
अनुवाद
काव्य-विजेता निश्चय ही परम सौभाग्यशाली थे। उनकी विपुल विद्वत्ता और पाण्डित्य के बल पर उनका जीवन सफल हुआ और इस प्रकार उन्हें भगवान चैतन्य महाप्रभु की शरण प्राप्त हुई।
 
That victorious poet was certainly extremely fortunate. His life was blessed by his vast knowledge and erudite study skills, and thus he attained the shelter of Chaitanya Mahaprabhu.
तात्पर्य
श्री नरोत्तम दास ठाकुर ने गाया है कि भगवान चैतन्य के चरण कमलों की शरण लेने के लिए सबसे अच्छी योग्यता सबसे अधिक पतित होना है क्योंकि भगवान विशेष रूप से पतित आत्माओं को उद्धार करने के लिए आए थे। इस युग में बहुत कम विद्वान हैं। लगभग हर कोई पतित माँसाहारी, शराबी, स्त्री-शिकारी या जुआरी है। ऐसे व्यक्तियों को कभी भी विद्वान विद्वान नहीं माना जाता है, भले ही वे ऐसा दिखावा करते हों। क्योंकि ये तथाकथित विद्वान सतही तौर पर देखते हैं कि चैतन्य महाप्रभु पतित आत्माओं के साथ जुड़ते हैं, वे सोचते हैं कि वह निम्न श्रेणी के पुरुषों के लिए हैं लेकिन उन्हें उसकी आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार ऐसे विद्वान कृष्ण भावना आंदोलन की शरण नहीं लेते हैं। इसलिए, झूठे ज्ञान से भरा होना कृष्ण चेतना आंदोलन को स्वीकार करने के लिए एक अयोग्यता है। लेकिन यहां एक विशेष उदाहरण है, क्योंकि यद्यपि काव्य सम्राट एक महान विद्वान थे, भगवान ने भी उनके विनम्र समर्पण के कारण उनका पक्ष लिया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)