श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु की पौगण्ड-लीलाएँ  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.15.4 
पौगण्ड - लीला चैतन्य - कृष्णस्याति - सुविस्तृता ।
विद्यारम्भ - मुखा पाणि - ग्रहणान्ता मनो - हरा ॥4॥
 
 
अनुवाद
पौगण्ड काल में भगवान की लीलाएँ अत्यन्त व्यापक थीं। शिक्षा ही उनका मुख्य कार्य था और उसके बाद उनका अत्यंत सुन्दर विवाह हुआ।
 
During his youth, Mahaprabhu's pastimes were extensive. His primary focus was education, followed by a beautifully arranged marriage.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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