श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 15: महाप्रभु की पौगण्ड-लीलाएँ  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.15.27 
न गृहं गृहमित्याहुगृहिणी गृहमुच्यते ।
तया हि सहितः सर्वान्पुरुषार्थान्समश्नुते ॥27॥
 
 
अनुवाद
"सिर्फ़ एक घर ही घर नहीं होता, क्योंकि पत्नी ही घर को उसका अर्थ देती है। अगर कोई अपनी पत्नी के साथ घर में रहे, तो वे दोनों मिलकर मानव जीवन के सभी हितों को पूरा कर सकते हैं।"
 
"A home is not just a home. It is the wife who makes a home meaningful. If a man lives in a home with his wife, together they can fulfill all the goals of human life."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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