श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  1.14.97 
श्री - रूप - रघुनाथ - पदे यार आश ।
चैतन्य - चरितामृत कहे कृष्णदास ॥97॥
 
 
अनुवाद
श्री रूप और श्री रघुनाथ के चरणकमलों की प्रार्थना करते हुए, सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए, मैं, कृष्णदास, उनके पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए, श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन करता हूँ।
 
Praising the lotus feet of Sri Roop and Sri Raghunath and always seeking His grace, I, Krishnadasa, am narrating Sri Chaitanya Charitamrita, following in His footsteps.
 
इस प्रकार श्री चैतन्य-चरितामृत, आदि लीला, के अंतर्गत चौदहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)