विप्न कहे , - पुत्र यदि दैव - सिद्ध हय ।
स्वतः - सिद्ध - ज्ञान, तबे शिक्षा व्यर्थ हय ॥88॥
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अनुवाद
ब्राह्मण ने उत्तर दिया, “यदि आपका पुत्र एक दिव्य रहस्यदर्शी बालक है, जिसके पास स्वयं प्रकाशमान पूर्ण ज्ञान है, तो आपकी शिक्षा का क्या उपयोग है?”
The Brahmin replied, “If your son himself is a divine yogi full of radiance and complete knowledge, then what is the use of your education?”
तात्पर्य
ब्राह्मण जगन्नाथ मिश्र ने अपने स्वप्न में देखा कि उनके पुत्र कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। यदि वे पारलौकिक व्यक्ति होंगे तो उनमें स्वयं-प्रकाशित ज्ञान होगा, और इस प्रकार उन्हें शिक्षित करने की कोई ज़रूरत नहीं होगी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥