श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  1.14.85 
“मिश्र, तुमि पुत्रेर तत्त्व किछुइ ना जान ।
भर्त्सन - ताड़न कर , - पुत्र करि’ मान” ॥85॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्यारे मिश्रा, तुम अपने बेटे के बारे में कुछ नहीं जानते। तुम उसे अपना बेटा समझते हो, इसलिए उसे डाँटते और सज़ा देते हो।"
 
"My dear Mishra, you know nothing about your son. You scold and torture him, thinking he is your own son."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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