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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 1: आदि लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु की बाल-लीलाएँ  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.14.44 
तबे शची कोले क रि’ कराइल सन्तोष ।
लजित हइला प्रभु जानि’ निज - दोष ॥44॥
 
 
अनुवाद
तब शचीमाता अपने पुत्र को गोद में लेकर उसे शांत करातीं और भगवान बहुत लज्जित होकर अपना दोष स्वीकार करते।
 
Then Shachimata would take her son in her lap and calm him down and Mahaprabhu would accept his mistakes and feel very ashamed.
तात्पर्य
चैतन्य-भागवत आदि-खंड के तीसरे अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु के बचपन के दोषों का एक अच्छा वर्णन है, जहां यह कहा गया है कि एक बच्चे के रूप में प्रभु पड़ोसी मित्रों के घरों से सभी प्रकार के खाने की चीजें चुरा करते थे। कुछ घरों में वो दूध चुराकर पीते थे और अन्य में बनें चावल चुराकर खाते थे। कभी-कभी वो खाना बनाने के बर्तन तोड़ देते थे। अगर खाने के लिए कुछ नहीं होता था लेकिन छोटे बच्चे होते थे तो प्रभु उन बच्चों को चिढ़ाते थे और उन्हें रुला देते थे। कभी-कभी कोई पड़ोसी शचीमाता से शिकायत करता था, "मेरा बच्चा बहुत छोटा है, लेकिन आपका बच्चा उसके कानों में पानी डालकर उसे रुला देता है।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)